Tuesday, April 29, 2014

समर्थन हाउस

हम दुनिया के सारे रंगों का समर्थन करते हैं.
हम दुनिया की सारी नस्लों का समर्थन करते हैं.
हम हवा, पानी, धरती, आकाश, धूप, छाँव, बरखा सब का समर्थन करते हैं.
जो हमसे प्रेम करे, जो हमसे नफ़रत करे,जो हमारा नुक़सान करे, जो हमें नफ़ा पहुंचाए, हम उन सभी का समर्थन करते हैं.
जो हमारे साथ आये, जो हमसे दूर भागे, जो हमसे डरे, जो हमें डराए, हम सभी का समर्थन करते हैं.
जो मांगे, जो न मांगे, हम उसका भी समर्थन करते हैं.
जो न ले, हम जबरदस्ती उसका समर्थन करते हैं.
हम ईस्ट,वेस्ट,नॉर्थ,साउथ सभी का समर्थन करते हैं.
हम लेफ्ट-राइट, ढीले-टाइट सबका समर्थन करते हैं.
हम बटेरों, ठठेरों, लुटेरों, कठोरों का समर्थन करते हैं.
हम मूक - वाचाल - चपल- लम्पट- संत- ज्ञानी-ध्यानी-तपस्वी-सिद्ध-प्रसिद्ध सभी का समर्थन करते हैं.
जो हमसे पहले थे, जो हमारे बाद होंगे, हम उनका समर्थन करते हैं.   
हम सभी वादों, इज़्मों,सिद्धांतों, सिद्धान्त-हीनताओं का समर्थन करते हैं.
हम रईस-फ़कीर-फक्कड़-अक्कड़-शक्की- झक्की-सीधों-टेढ़ों-वक्रों-चक्रों का समर्थन करते हैं. 
… हमारा इम्तहान मत लो, हमने हमेशा सीने पर गुलाब टाँगे  हैं, "कमल" का समर्थन ? हर्गिज़ नहीं!
"जो तोको झाड़ू धरै, ताहि दे तू समर्थन 
साम-दाम चलता रहे सत्ता-मंच पे नर्तन !"        

लोकतंत्र इसलिए पांच साल में करवट बदलता है?

एक शराब खाने में कुछ विद्यार्थी घुस गए. वे सभी शोध छात्र थे और किसी न किसी मुद्दे को लेकर अनुसन्धान कर रहे थे. वे जानते थे कि  वहां बैठे लोग उनके इस काम को पसंद नहीं करेंगे, फिर भी वे अपने बैग से डायरी और पैन निकाल कर वहां बैठे ग्राहकों से चंद सवाल करने में जुट गए.एक सवाल प्रायः सभी से पूछा गया- "आप क्यों पीते हैं?"
सवाल एक था, किन्तु जवाब अलग-अलग मिले-
-"शराब पीकर मैं थोड़ी देर के लिए वही हो जाता हूँ, जो मैं हूँ "
-"शराब पीकर मुझे लगता है कि चलो कुछ समय के लिए तो मैं बदल गया "
-"शराब मुझे उसकी याद दिलाती है जो मैंने खो दिया"
-"शराब उसे भुला देती है जो अब मेरा नहीं है "
-"शराब मेरी थकान उतार देती है"
-"शराब मेरा नशा उतार देती है"
-"शराब पीते हुए मुझे लगता है कि ग़ालिब, मीर , बच्चन, खैय्याम सब मेरी ही बात कर रहे हैं "
विद्यार्थियों ने निष्कर्ष निकाला कि हमारा संविधान हर पांच साल बाद सत्ता- नवीसों को चुनाव लड़ने के लिए इसीलिए भेजता है कि "चुनाव" भी एक तरह का नशा है, जो लोकतंत्र की ओवरहॉलिंग कर देता है.      

Monday, April 28, 2014

लो, समंदर भी मैला हो गया

लोगों की आदत बड़ी खराब होती है. सुबह-सुबह साफ़ धुला सफ़ेद झक्क रुमाल इत्र लगा कर जेब में रखते हैं, और फिर दिन के किसी भी समय मौक़ा देख कर इसे नाक से लगा कर मैला कर डालते हैं.
और तो और, गंगा तक को नहीं छोड़ा लोगों ने. इसमें अपने इतने पाप धोये कि  बेचारी गंगा भी मैली हो गई.
और अब तो हद ही हो गई.समंदर पर भी आफ़त आ गई. इसमें लहर दर लहर इतने लोग आते जा रहे हैं कि समंदर की सतह धरती से ऊपर निकली जा रही है.लेकिन लोग हैं कि  आते ही जा रहे हैं.
ज्यादा जनसँख्या वाला देश होने का यही तो नुक्सान है कि  कोई अपनी मासूमियत में यदि लोगों से कह दे कि समंदर में जा पड़ो , तो लोग आज्ञाकारी बच्चों की तरह जा-जाकर सागर में ही गिरने लग जाते हैं.
मजे की बात ये है कि समंदर इनसे ही भरा जा रहा है,जबकि ये तो केवल वे लोग हैं जिन्होंने केवल एक आदमी को वोट दिया है.
चलो अच्छा है, टीम को वोट देने वाले गिने-चुने ही निकले वर्ना धरती पर भी बेकार समंदर जितना ही बोझ बढ़ जाता.     
            

Saturday, April 26, 2014

किंडर गार्टन,यूरो- किड या सरस्वती विद्या मंदिरों के ये मास्टरजी

 देश में चुनाव के चलते आज एक नज़ारा आम है. हर टीवी चैनल पर मीडिया कर्मी पत्रकार-गण अलग-अलग पार्टियों के नुमाइंदों को बुला कर बैठा लेते हैं और फिर किसी न किसी मुद्दे को लेकर, कभी-कभी बेमुद्दा भी, उन पर सवालों की बौछार कर देते हैं. उसके बाद ये नेता गण जवाब देने में चीखते-चिल्लाते, पसीना बहाते दिखाई देते हैं.यहाँ तनाव पत्रकारों के चेहरे पर नहीं, बल्कि नेताओं के चेहरे पर होता है क्योंकि कैमरा पत्रकारों का होता है.कई बार तो कैमरा बात पूरी होने से पहले ही हटा लिया जाता है और फिर उनके बयान को चाहे जैसे तोड़ा -मरोड़ा जा सकता है.
ये चर्चाकार कई बार तो सभी सीमायें लांघ जाते हैं और किसी प्राइमरी स्कूल टीचर की तरह नेताओं को बच्चों की तर्ज़ पर डाँटते भी देखे जाते हैं.
यह सब अच्छा है, यदि ये तंज भरी तान देश हित में हो, अच्छे चुनाव के लिए हो, राजनैतिक अनुशासन के लिए हो.
पर …
ये कड़क मास्टरजी कहीं चुनाव के बाद इन्हीं नेताओं के सामने हाथ जोड़ कर कल "श्री" "भूषणों " और "रत्नों " की लाइनों में लगे नज़र न आएं. क्षमा ! 
         

फ्यूडलिज़्म इस को कहते हैं

एक राजा हो, एक मंत्री हो, एक सेनापति हो, एक सिपाही हो.
फिर कुछ वर्ष बीतें, और राजा का पुत्र नया राजा हो, मंत्री का पुत्र नया मंत्री हो, सेनापति का पुत्र राज्य का नया सेनापति बने और सिपाही का बेटा फ़ौज में सिपाही हो.
आम तौर पर इस व्यवस्था को "फ्यूडलिज़्म" या सामंतशाही समझा जाता है.यह वर्षों तक प्रचलन में रही है, और इसमें कुछ अपवादों को छोड़ कर कोई बहुत बुरी बात भी नहीं देखी गई है.क्योंकि यह माना जाता है कि  हर पुत्र प्रायः अपने पिता का काम तो बेहतर समझता ही है .
फिर सामंतशाही से त्रस्त होकर इसे हटाने की मुहिम क्यों चलती है ?
इसलिए कि समय के साथ बीच-बीच में एक नए किस्म की सामंतशाही भी पनप जाती है.
इस नई सामंतशाही में राजपुत्र तो नया राजा बनता ही है किन्तु राजा का रथ हांकने वाला, राजा को नहला-धुला कर तैयार करने वाला, राजा की रसोई बनाने वाला, राजा के वस्त्र-प्रक्षालन करने वाला और राजा का निजी सेवक राज दरबार के हाकिमों के बड़े पदों पर खुद को सुशोभित देखना चाहते हैं.उनकी एकमात्र योग्यता "राजा तक निजी पहुँच" होती है. राजा को भी इन्हें मूक-स्वीकृति देनी पड़ती है क्योंकि ये उसके विश्वासपात्र  "सेवक" होते हैं.
हमारे देश में ऐसे कई प्रधान मंत्री हुए हैं, जो कब हुए,क्यों हुए, किसकी मेहरबानी से हुए, ये कोई नहीं   जानता. वे कब तक रहे, कब चले गए, उन्होंने क्या  किया, इसके बारे में भी किसी ने कोई खास ध्यान नहीं दिया. इनमें सप्ताह, महीना, सालभर रहने वाले भी थे और पाँच सौ तियालीस में से दस, बीस, पचास सीटें पाने वाले भी.कुछ तात्कालिक शोशे छोड़ने वाले भी.
लेकिन आज़ादी के बाद यह शायद पहला ऐसा अवसर है जब प्रधान मंत्री पद पर कार्य करने की दावेदारी जताने के इच्छुक किसी  व्यक्ति की आठों दिशाओं से, हर कसौटी से, हर योग्यता-क्षमता की परख की जा रही है, उसे हर कोण से जांचा- परखा जा रहा है, और बाल की खाल निकाल कर उस से अदृश्य बॉन्ड भरवाये जा   रहे हैं.वह क्या करेगा, कैसे करेगा, उसने अब तक क्या किया ? पूरा देश "सलेक्शन कमिटी" में है,  
मानो इस से पहले के सभी प्रधान मंत्री पूर्ण सक्षम,सर्व-स्वीकृत, सर्वगुण- संपन्न थे.
बहरहाल, यह एक अच्छा संकेत है, जो बताता है कि  देश वास्तव में "प्रधान मंत्री" चुनने जा रहा है.जो भी चुना जायेगा वह किसी "इज़्म" की सौगात नहीं होगा, बल्कि देश का एक दूरदर्शी- लोकप्रिय नेता सिद्ध होगा.                 

Friday, April 25, 2014

जेंडर डिसक्रिमिनेशन अर्थात लिंग आधारित भेदभाव

 एक मकान की छत पर शाम के समय कुछ लोग खड़े होकर मौसम का आनंद ले रहे थे, तभी दूर से दिखाई देते एक खेत के किनारे कच्चे रास्ते पर धूल उड़ाते हुए कुछ मवेशियों का झुण्ड गुज़रा.छत पर उपस्थित परिवार के लोगों के बीच से एक वृद्ध महिला ने कहा- "गायें जा रही हैं."
तभी एक छोटी सी बच्ची ने ध्यान से उधर देख कर खेल-खेल में गिनती शुरू की- "गाय,सांड,गाय, बछड़ा,बैल, गाय, बछड़ा … "
तभी मेरा ध्यान वास्तव में इस बात पर गया कि  जाने वाले समूह में सभी गायें नहीं हैं.
प्रायः ऐसा होता है, सामने से पक्षियों का झुण्ड उड़ कर निकलता है और हम कहते हैं, देखो तोते !निश्चय ही उनमें कुछ तोतियां [मादा तोते] भी होती होंगी.
जब रसोई की खुली खिड़की के सामने रखा दूध गायब मिलता है तो हम झट कह देते हैं कि  बिल्ली दूध पी गई.क्या हम जानते हैं कि  दूध किसी बिल्ली ने ही पिया है, बिलाव [नर] ने नहीं ?
इसी रसोई में जब शाम की बची बासी रोटी फेंकने की बारी आती है तो कहा जाता है कि  रोटी कुत्ते को डाल दो, कोई नहीं कहता कि कुतिया को रोटी डाल दो.
अगर आपको लगता है कि हम उसी वर्ग का नाम ले देते हैं जिसका नाम छोटा या आसान हो, तो ज़रा सोचिये- आसमान में उड़ते पंछियों को आप "चिड़िया उड़ रही हैं कहते हैं या चिड़े उड़ रहे हैं? आपने किसी को बकरे चराने जाते सुना है? सब बकरियां चराने ही जाते हैं. तालाब में नहाती भैसों में क्या भैंसे नहीं होते? पर हम कह देते हैं की भैंसें नहा रही हैं.यहाँ तक कि  हम यह कहने में भी नहीं चूकते कि कबूतर ने अंडे दे दिए.
ऐसे लोग, जो हिंदी कम जानते हैं या सीख रहे होते हैं, वे इस दुविधा में और भी उलझ जाते हैं.वे सोचते हैं कि इस उलझन को वे ही नहीं सुलझा पा रहे, जबकि हम हिंदी-भाषी लोग खुद भी इससे अनभिज्ञ हैं.
एक बार मेरे एक मित्र ने जब मुझसे पूछा- "आपने कैसे कह दिया कि मेज पर पैन रखा है और पेन्सिल रखी है, या मेज नीची है और स्टूल ऊंचा है ?" तो मेरे पास बगलें झाँकने के अलावा और कोई चारा नहीं था.क्या आपके पास है?    
      

Thursday, April 24, 2014

"द हिन्दू", हाँ-हाँ यही

 अभी कुछ दिन पहले एक अखबार में एक कार्टून देखा होगा आपने, जिसमें ट्रेक्टर चलाते हुए मोदीजी को दिखाया गया था, और उसके पहियों से घायल होकर सड़क पर पड़े कुछ अन्य नेताओं को.
शायद कार्टूनिस्ट कहना चाहता था कि मोदीजी केवल अपनी मर्जी से पार्टी चला रहे हैं, और अन्य नेताओं की बात नहीं सुन रहे हैं.
मुझे याद है कि  जब केंद्र में पहली बार विपक्ष की सरकार सत्ता में आई थी, तब इसी अखबार में एक कार्टून छपा था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री [मोरारजी देसाई] एक मुर्गी की तरह टोकरे में बैठे दिखाई दे रहे थे,और चारों ओर अलग-अलग पक्षियों के फूटे अण्डों से बच्चे झाँक कर चिल्ला रहे थे. 
मतलब ये था कि  सब अपनी-अपनी बात कह रहे हैं, और मुर्गी की कोई नहीं सुन रहा.
कहते हैं कि  "जन्म हो या मरण, पंडित तो लड्डू खायेगा"
जो लोग हमेशा इस बात से चिंतित रहे कि  कांग्रेस में एक के अलावा किसी की नहीं चलती वे अब इस बात से बेचैन हैं कि  भारतीय जनता पार्टी में केवल एक की ही चल रही है.
कॉलेज के दिनों में दोस्त एक चुटकुला अक्सर सुनाया करते थे-
"एक लड़की ने अपनी सहेली से पूछा- ये लड़के आपस में क्या बातें करते रहते हैं?
सहेली ने कहा- वही,जो हम लोग करते हैं.
-हाय, बड़े बदतमीज़ हैं. लड़की ने कहा."           

टीचर कोई भी हो सकता है, अतीत-वर्तमान भी, इंदिराजी-मोदीजी भी

बचपन में मुझे "डिबेटर" बनने का बड़ा शौक था, एक ही बात को हम दो अलग-अलग स्वरों में कैसे कह सकते हैं, यह सीखना मुझे अच्छा लगता था.
बात उन दिनों की है जब इंदिराजी ने प्रधान मंत्री पद नया-नया संभाला था. कांग्रेस के पुराने- बुजुर्ग और अनुभवी नेता सोचते थे कि  नई उम्र की यह महिला पद को सुशोभित करती रहेंगी, और फैसले हम लेंगे.किन्तु जल्दी ही लोगों ने देखा कि  मोरारजी, पाटिल, निजलिंगप्पा,कामराज आदि सिंडिकेट सदस्यों की आवाज़ धीरे-धीरे नेपथ्य में चली गई,यहाँ तक कि राष्ट्रपति चुनाव में उनकी पसंद के उम्मीदवार तक को इंदिराजी ने नहीं माना और अपना उम्मीदवार घोषित करके जिताया.
लगभग आधी सदी के बाद भारतीय जनता पार्टी में भी मोदीजी एकाएक उभरे.ऐसा लगा कि  आडवाणी जी, जोशीजी, जसवंत सिंह, गडकरीजी, सुषमाजी की बात कहीं धीमी हो रही है.
इन दोनों ही अवसरों पर यदि लोगों की कही हुई बातें ध्यान से सुनें, तो हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है.
जो लोग उस समय कह रहे थे- "वाह, क्या व्यक्तित्व है, सबको एक तरफ बैठा दिया, पुरानी सोच को हटा कर पार्टी में 'नयापन' फूंक दिया" वही अब कह रहे हैं-"क्या तानाशाही है, बड़ों के सम्मान को ठेस पहुंचाई है".
जो बच्चे भविष्य में "डिबेटर" या "प्रवक्ता" बनना चाहते हैं, वे सीखें कि एक ही बात को अलग-अलग अवसर पर, अलग-अलग सुरों में कैसे कहते हैं.     
   
      

Tuesday, April 22, 2014

उपलब्धि

एक समंदर के रेतीले किनारे पर सुबह की गुनगुनी धूप में छोटा सा एक घोंघा बार-बार अपनी गर्दन खोल में से निकाल कर इधर-उधर देख रहा था. ऐसा लगता था कि वह अपने दिल की कोई बात किसी से कहना चाहता है.एक मीठी सी बेचैनी उसे उतावला किये हुए थी.
लो, भला दुनिया में कुछ शिद्दत से चाहो, और वो न मिले, ऐसा हो सकता है ? सामने ही रेंग कर उस तरफ आती एक नन्ही सी सीप उसे दिख गई.
वह थोड़ा और नज़दीक आये, तो उसे अपनी बात कहूँ, ये सोचते हुए घोंघे ने मुश्किल से सब्र रखा.
जब वह बिलकुल करीब आ गयी, और यह इत्मीनान हो गया कि  अब वह उसे साफ़-साफ़ सुन पा रही है, घोंघे ने हुलस कर कहा-"ओ सुन,आज मैंने एक छोटी मछली से रेस लगाई"
-"अच्छा, कौन जीता?" सीप ने भी अजनबी में दिलचस्पी लेते हुए कहा.
-"मैं, और कौन?" घोंघे का जोश लेशमात्र भी कम नहीं हुआ था.
-"मछली बीमार होगी?" सीप ने घोंघे के उत्साह को थोड़ा कसना चाहा.
-"अरे नहीं, वह तो पूरी ताकत से तैर रही थी." घोंघा भला अपनी उपलब्धि कम क्यों होने देता?
-"तो तू फेसबुक पर डाल दे, सबको पता चल जायेगा" सीप ने सलाह दी.
तभी उनकी बात एकाएक उमड़े कोलाहल में दब कर रह गई. अचानक वहां पंछियों का एक बड़ा झुण्ड चहचहाते हुआ चला आया. कूदते-फुदकते सब कुछ न कुछ बोल रहे थे. बीच-बीच में आवाज़ें आती थीं-
"मैं ने तलहटी से शिखर तक की दूरी तीन-घंटे में पूरी की, बाज़ को तो मैंने खूब छकाया, अरे, चील तो मुझे देख कर मुंह में पानी भरे बैठी थी, पर मैं 'ये जा- वो जा', उड़न छू हो गया, हरिण भी क्या याद रखेगा, वह डाल-डाल तो मैं पात - पात, मैं तो ऐसा दौड़ा कि चीता भी घुटने टेक कर पसर गया."
एक हलकी सी लहर आई, और घोंघे ने सोचा-" धूप बढ़ रही है,क्यों न घर लौटूं!" और वह पानी में समा गया.        
             

Sunday, April 20, 2014

क्या आप बता सकते हैं कि इन्होंने किसे वोट दिया होगा ?

एकाएक आम आदमी पार्टी की प्रतिष्ठा बढ़ती देख एक वोटर महाशय ने कसम खाकर ऐलान कर दिया कि  वे हर हाल में इसी पार्टी को वोट देंगे.वे चल दिए बूथ की ओर. रास्ता कुछ लम्बा था, अतः अपने आपको सोचने से नहीं रोक पाये.रास्ते में सोचने लगे-
*अरे, ये तो कहते थे कि  न किसी का समर्थन लेंगे न किसी को देंगे ?
*अरे, ये तो कहते थे कि  दिल्ली की जनता का सम्मान करने के लिए सरकार बना ली, इन्हें २८ सीट देने वाली दिल्ली की जनता थी तो विरोधियों को ३२ सीटें देने वाली दिल्ली की जनता नहीं थी ?
* अरे, डेढ़ महीने बाद दिल्ली की जनता के सम्मान का क्या हुआ?
*अरे, ये तो कहते थे कि  भ्रष्टाचार करने वाले नेता को "झाड़ू"फेर कर हटाएंगे, इनके हटाये हुए तो राज्यपाल बन कर मौज कर रहे हैं ? अब जांच से सुरक्षित भी हो लिए.
*अरे, इन्हें तो दस-दस रूपये मुश्किल से मिलते हैं, ये बेचारे बस में भी कैसे घूम सकते हैं ?
*अरे,पर केंद्र से मदद-समर्थन लेने-देने का रेट क्या दस रूपये ही है ?
*अरे, इनके हराए मुख्यमंत्री की पदोन्नति हुई तो ये कम से कम धरने पर तो बैठ ही सकते थे ?
*अरे, ये बेचारे कर ही क्या सकते थे, गर्मियों में मफलर कौन पहनता है ?
सोचते-सोचते जा ही रहे थे कि सामने बूथ आ गया.सोचा- पान-तम्बाकू का मज़ा निगलने में उतना नहीं है जितना थूकने में.कसम का क्या है ? आज खाई कल थू …      

Saturday, April 19, 2014

ये जानते हुए भी कि कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगेगा

इन दिनों लिखी जा रही हिंदी लघुकथाओं में एक बात बहुत विचलित करने वाली है.बड़े पैमाने पर ऐसी रचनाएँ लिखी जा रहीं हैं, जिनमें संवेदना जगाने के लिए इंसान के बुढ़ापे की निरीहता को चित्रित किया जा रहा है, दुःख की झांकी दिखाने के लिए असाध्य रोगी पात्र दिखाए जा रहे हैं, मर्मस्पर्शी आख्यानों की लालसा में दुर्घटनाओं और उनसे उपजी रिक्तता, अनाथ हो जाने के दर्द, सुहाग उजड़ जाने के चित्रण किये जा रहे हैं.
ये सभी ऐसी परिस्थितियां हैं, जो अपरिहार्य हैं.इन पर किसी का कोई वश नहीं है.  ये होती आई हैं और आगे भी होंगी ही.
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इनकी बात करके हम पाठक की मनुष्यता को नीचा और बेबस दिखा रहे हैं.हम पढ़ने वालों को किसी बंद गली के आखिरी मकान तक छोड़ आते हैं और वहां का वीरान घटाटोप इंसान को अपनी नज़र में चींटी बना देता है.
सार्वभौमिक दुःख को गाकर हम क्या कहना चाहते हैं?
साहित्य की पूरी कवायद चीज़ों को सुधारने के लिए जद्दो-जहद करने की है.हमें उन दीवारों से सिर  टकरा कर क्या हासिल जो कभी नहीं टूटेंगी.
यदि ऐसा करके आप नई पीढ़ी से "सहानुभूति" मांग रहे हैं तो दो बातें ध्यान रखिये-
-दैव योग से घटने वाली घटनाएँ नयी-पुरानी पीढ़ी का अंतर नहीं जानतीं.
-इनके चित्रण में आपका फोकस किसी रोगी, दिवंगत या लाचार पर न होकर हृदयहीन, न पसीजने वाले, गैर-मानवीय मूल्यों वाले पात्रों पर अधिक होना चाहिए. मोम तो यहाँ पिघलाना है.         
        

ये कैसी कहानी , इस से तो चुनाव की बात ही अच्छी

एक विशालकाय जहाज समंदर में डूब रहा था. जहाज के वाशिंदे अपनी-अपनी हैसियत- भर चिल्ल-पौं मचाये हुए थे.विशाल लहरों पर किसी बजरे की तरह डबडबाते मायावी सफ़ीने की नियति भाँप किनारे के पंछी-पखेरू भी छाती पीटते थकते न थे. कुछ आभासी कलंदर जहाज से नीचे झांकते, और स्वतः ही बड़बड़ा उठते- " नहीं, नहीं, ये लहरें नहीं, हो ही नहीं सकतीं. लहरें तो वे थीं, जब हमारे सफ़र का आगाज़ हुआ था. अंजाम पे भला कैसी लहरें ? किसकी लहरें ?
जहाज पर मंडराते परिंदों ने कभी न कभी जहाज के भीतर चुगते हुए उसका नमक खाया था.सो उनका दिल गवाही नहीं देता था कि रोएँ ना.लिहाज़ा बिलख रहे थे.
उधर दूसरे किनारे पर दूसरा जहाज लंगर खोल कर समंदर का इस्तक़बाल कर रहा था. उसके मस्तूल पर फहराती पताकाओं की शोखी कहती थी कि  बात दूर तलक जाएगी. तेज़ी से झूमती तूफ़ानी लहरें उम्मीद के पलाश बिखराती थीं. सामने दिखाई देता ये बावरा अब डूबे, तब डूबे कि समंदर खाली हो. बहुत रौंदा इसने चारों दिशाओं की मछलियों को.अब दोजख में अपनी ठौर तलाशे.
एक तीसरी नौका भी थी.कभी इधर पछाटें खाती तो कभी उधर कुलांचें भरती. खुद अपने से बेज़ार, अपने ग़म से बेज़ार। न जानती कि  कहाँ जाना है, न पहचानती कि  क्या करना है.कभी अपनी पतवारों से पीट-पीट कर खुद को ज़ख़्मी कर लेती तो कभी बिना पानी के किनारे पर डूब मरती.
अब कहानी का कोई अंत हो तो पता चले, पुराने दरख्तों का पतझड़ हो ले, नए बिरवों की कोपलें फूट लें तो कुछ पता चले. आएंगे-जाएंगे तो जहाज ही, समंदर कहाँ भागा जाता है ? थोड़ी देर और ठहर !                                

Thursday, April 17, 2014

घटी जयशंकर प्रसाद की कामायनी

 जब किसी लेखक की कोई रचना लोक को अर्पित होकर सार्वजनिक हो जाती है तो उस पर किसी का, खुद लेखक का भी अधिकार नहीं रह जाता. उसे "काल"कब क्या बना दे यह कोई नहीं जानता.
कुछ दिन पहले एक सुबह अचानक ऐसा ही हुआ.
देखते-देखते बरसों पहले लिखी गई जयशंकर प्रसाद की महान रचना "कामायनी" एकाएक छोटी, अधूरी सी हो गई. जैसे एक लेखक समय के प्रताप से दिवंगत होकर भी दुनिया के नेपथ्य में बड़ा होता चला जाता है, वैसे ही मनु और श्रद्धा की यह कालातीत प्रेमकथा सहसा छोटी हो गई.
ऐसा कैसे हुआ?
क्या किसी ने इसके कुछ पृष्ठ मिटा डाले? या फिर इसके पात्रों की अहमियत कम हो गई.यह सर्वकालिक प्रणयगाथा सीमित क्यों और कैसे हो गई? किसने किया यह सब?
भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने !
उसने स्त्री और पुरुष के साथ-साथ अब "किन्नरों" को भी तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देदी. देशवासियों को "तीसरे इंसान" के जन्म की ढेरों बधाइयाँ ! 
          

Sunday, April 13, 2014

"मीडिया वाला"

दो बच्चे एक पेड़ के नीचे पड़े मिट्टी के ढेर में खेल रहे थे. कभी वे कोई घर जैसी इमारत बना लेते, तो कभी उसे तोड़ कर मिट्टी की गाड़ी बना लेते.जल्दी ही दोनों ऊब गए.पर शाम का धुँधलका अभी पूरी तरह हुआ नहीं था, इसलिए इतनी जल्दी घर लौट जाने को भी दोनों तैयार नहीं थे.
तभी उधर से एक बूढा फ़कीर आ निकला.वह बेहद अशक्त और कृशकाय था, उससे ठीक से चला भी न जाता था. बच्चे बहुत ध्यान से उसे देखने लगे.बच्चों को प्यार से देखता वह उस ओर ही आने लगा.
बच्चे पहले तो कौतुहल से देखते रहे किन्तु कुछ नज़दीक आने पर उन्होंने देखा कि फ़कीर की शक्ल खासी डरावनी है. बच्चे कुछ भयभीत हुए पर वे दो थे, एक दूसरे की हिम्मत का सहारा था, और इतने जर्जर बूढ़े से खौफ़ खाने की कोई वजह नहीं थी.
बूढ़ा लड़खड़ाता हुआ उनके पास ही आ बैठा.उसका दम भी कुछ फूलता सा लगता था, सांस तेज़ी से चल रही थी.
उसे अपनी तुलना में बिलकुल निरीह पाकर बच्चों का हौसला बढ़ा.एक बोला- बाबा, आप बहुत थके से लगते हो, हम आपके लिए कुछ खाने-पीने का सामान लाएं ?
बाबा ने उत्तर दिया- बेटा, मुझे ज़िंदगी में जो खाना-पीना था वह मैं खा चुका हूँ,अब तो तुम मुझ पर एक उपकार करो, जिस मिट्टी के ढेर में तुम खेल रहे हो,उसी से मेरी एक मूरत बना दो.
-क्यों बाबा, उससे क्या होगा? बच्चों ने एकसाथ अपनी उत्सुकता जताई.
-बेटा,जब मैं न रहूँगा तो कभी न कभी कोई टीवी वाला इधर से गुज़रते हुए मेरे बुत की तसवीर खींच लेगा, और जब उसे परदे पर दिखा देगा तो मेरे सभी जानने वालों को कम से कम पता तो लग जायेगा कि मैं अब न रहा.
-ठीक है बाबा, कह कर एक बच्चा आज्ञाकारी शिष्य की भांति मिट्टी से बाबा का बुत  बनाने में जुट गया.
दूसरा बच्चा भी मिट्टी लेकर एक और बुत बनाने लगा.
बाबा ने आश्चर्य-मिश्रित ख़ुशी से कहा- ओह, तुम भी बना रहे हो, तो मेरे दो-दो बुत ?
-नहीं बाबा, मैं तो एक ख़ूबसूरत लड़की की मूर्ति बना रहा हूँ.
-क्यों? बाबा हैरान था.
-इसे आपकी मूर्ति के पास रख देंगे।
-लेकिन क्यों? बाबा बोला.
-अरे, तभी तो कोई कैमरे वाला देखेगा आपकी तरफ! दोनों बच्चों ने लापरवाही से कहा.                           

Saturday, April 12, 2014

प्रौद्योगिकी के सहारे

इन दिनों देश में चुनाव का माहौल है. जीत-हार हो जाने के बाद तय हो जायेगा कि कौन शहंशाह और कौन ख्वामखाह, लेकिन अभी तो नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ढोल-नगाड़ों पर तरह-तरह की तान  सुनने को मिल रही है.
एक दल ने दूसरे के मुखिया पर लांछन लगाया कि उन्होंने शादी करने के बाद अपनी पत्नी की सुध नहीं ली.
दूसरे दल ने झट पलटवार किया कि इन्होंने शादी करने के बाद उसे समय ही तो नहीं दिया, आपके मुखिया ने तो अब तक उसे ढूँढा ही नहीं है, न जाने बेचारी कहाँ होगी, किस हाल में होगी?
तभी एक अति बुजुर्ग नेताजी बोल पड़े- "आजकल प्रौद्योगिकी बहुत उन्नत है, बत्तीस साल बाद भी पता चल जाता है कि  किस-किस का कौन-कौन कहाँ-कहाँ  है?        

आवश्यकता और आकांक्षा

 एक बार एक आदमी को स्वप्न में एक तोता दिखा।
खास बात ये थी कि तोता बोलता था और वह बात कर रहा था. बात भी आम तोतों की तरह नहीं कि  बस जो सुना, दोहरा दिया.बाकायदा वह तोता अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग कर रहा था और प्रभावशाली मौलिक बातें कर रहा था.
उसने आदमी को प्रस्ताव दिया कि  वह तोते से कुछ मांग ले, क्योंकि वह तोता उसे देने में सक्षम है.
आदमी ने अवसर का लाभ उठाना श्रेयस्कर समझा.
उसने तुरंत तोते से कहा कि वह लगातार अंतरिक्ष में घूम कर धरती को देखते रहना चाहता है.
तोते ने कुछ सोच कर पूछा-"वह ऐसा कितनी देर के लिए करना चाहेगा?"
आदमी ने कहा, अनंत काल तक.
अचानक तोते की जिज्ञासा बढ़ी, वह बोला- "मैं 'तथास्तु' कहूँगा किन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि  आखिर तुम धरती में ऐसा क्या देखना चाहते हो, जो तुम्हें अंतरिक्ष से ही दिखाई देगा?"
आदमी बोला- "मैं एक चरवाहा हूँ, जब मेरी बकरियां चरती-चरती इधर-उधर निकल जाती हैं तो उन्हें ढूंढने में मुझे बड़ी परेशानी होती है."
तोता तुरंत बोला- "ओह, यह आसान है, पर तुम इस अवसर को खो दोगे."
आदमी मायूसी से बोला- "लेकिन क्यों?"
तोते ने कहा- "अभी तुम नींद में हो, जागते ही तुम मेरी शक्ति का प्रताप खो दोगे, और अभी तो तुम्हारी बकरियां तुम्हारे बाड़े में ही बँधी हैं.क्या तुम अनंत काल तक सोना चाहोगे ?"
आदमी की नींद और तोता, दोनों उड़ चुके थे.             

Friday, April 11, 2014

ऋतु आये फल होय

एक फिल्म में देखा था कि एक ट्रक ड्राइवर ने शराब के नशे में गाड़ी चलाते हुए एक निर्दोष आदमी की जान लेली. अदालत में मुकदमा चला. बचने का कोई कारण  नहीं था. कानून की धाराओं के चलते उम्रकैद भी दी जा सकती थी, और फांसी भी, क्योंकि जिसे मारा वह अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला था, अशिक्षित पत्नी थी, और छोटे-छोटे मासूम बच्चे.
न्यायाधीश ने एक अजीबोगरीब फैसला सुनाया. कहा-ट्रक ड्राइवर पीड़ित परिवार के साथ रहेगा, और उसका भरण-पोषण करेगा.अपराधी पश्चाताप की आग में जलता भी रहा, प्रायश्चित भी होता रहा, निराश्रित खानदान की परवरिश भी होती रही, कानून पर अन्याय के छींटे भी नहीं लगे.
फिल्म थी "दुश्मन", कलाकार थे राजेश खन्ना, मुमताज़ और मीना कुमारी.
दुष्कर्म या बलात्कार करने वाला, राक्षस है, उसे फांसी होनी ही चाहिए.लेकिन सोचिये, क्या इस से भी माकूल कोई और सजा नहीं हो सकती?
कई बार ऐसा होता आया है कि  हम जिस से आज मोहब्बत करें, उस से कल नफरत करने लगें.जिस से आज नफरत करें, उस से कल मोहब्बत करने लगें।
लेकिन यदि हमने "आज" को ज़िंदा जला दिया,तो कल की सब संभावनाएं भी दफ़न हो जाएँगी.
ये किसी भी कोण से मुलायम सिंह यादव के बयान का बचाव नहीं है.               

Wednesday, April 9, 2014

झूठी,आलसी,निकम्मी,कामचोर,अहसान फरामोश

एकबार गिलहरी,चूहे,खरगोश,छिपकली,मेंढ़क आदि कुछ मित्रों ने मिल कर जंगल में एक कमरा किराए से ले लिया.मिला भी सस्ता, क्योंकि लोमड़ी के पास तो कई थे.
जंगल में हवा भी चलती थी, तूफ़ान भी आते थे, बारिश भी होती थी, चलो, अब इन सबसे छुटकारा मिला.
कुछ दिन तो मज़े से बीते लेकिन फिर एक दिन बैठे-बैठे उन सबका माथा ठनका. सबने देखा, कमरा दिनोंदिन गन्दा होता जाता है. जंगल में तो हवा-पानी से सब जगह सफाई होती रहती थी, मगर अब इस कमरे में तो दुनिया-भर का कचरा जमा होने लगा.सब चिंतित हो गए.
जाकर लोमड़ी से शिकायत की- "मैडम, आपका कमरा तो दिनोंदिन गन्दा होता जाता है."
लोमड़ी ने कहा- "प्यारे बच्चो,सफाई की  जिम्मेदारी मकान-मालिक की  नहीं, किरायेदार की  होती है, तुम एक झाड़ू लाकर रखो, सब ठीक हो जायेगा."
उत्साह में भरे सब एक झाड़ू खरीद लाये.कुछ दिन बीते, तो फिर सबका ध्यान इस बात पर गया, कि कमरा तो अब भी गन्दा का गन्दा ही है !
वे सब बौखला कर झाड़ू के पास जाकर बोले- "क्योंजी, तुम्हारा फायदा ही क्या है? गंदगी तो ज्यों-की त्यों है."
झाड़ू कुछ न बोली, बस, मासूमियत से धीरे-धीरे मुस्कराती रही.
इस ढीठपने से सब क्रोधित होकर उखड़ गए और लगे झाड़ू को कोसने- "झूठी, आलसी,निकम्मी, कामचोर,अहसान फरामोश … "
तभी खिड़की से झांक कर लोमड़ी बोली- "बेटा, झाड़ू पड़ी- पड़ी सफाई नहीं करती, इसे हाथ में लेना पड़ता है !" यह सुन कर सब हक्के-बक्के रह गए और खूब शर्मिंदा हुए.
शिक्षा-हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि झाड़ू पड़ी-पड़ी सफाई नहीं करती, इसे "हाथ" में लेना पड़ता है !             

आपको क्या सही लगता है?

किसी समय भारत में एक पूरे जीवन को चार आश्रमों में बाँट दिया जाता था-ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम. इन सभी में उम्र बिताने के लिए औसतन २५ साल का समय निर्धारित था. इस तरह यह माना जाता था कि एक व्यक्ति की औसत आयु सौ वर्ष होगी.
अब न तो औसत उम्र सौ साल रही है, और न ही जीवन पहले जैसा सरल, एकसा और साधारण रहा है. अब जन्म, परवरिश करने की  शैली , सामाजिक स्तर , आर्थिक सम्पन्नता और निजी पसंद-नापसंद को देखते हुए बातें तय होती हैं.
यदि हम जीवन को निम्न अवस्थाओं में बाँटें-
-बचपन
-किशोरावस्था
-युवावस्था
-प्रौढ़ावस्था
-वृद्धावस्था
तो आप मनुष्य की  औसत आयु ८० वर्ष मानते हुए इन अस्सी सालों को इन पाँच अवस्थाओं में कैसे बांटेंगे?यह बिलकुल आवश्यक नहीं है कि हम इन अवस्थाओं को बराबर के "साल" दें.  फिर हम यह भी निर्धारित करेंगे कि एक औसत व्यक्ति को इन अवस्थाओं में ज़िंदगी के क्या-क्या कार्य, कब-कब सम्पादित कर लेने चाहिए.
नोट- मुझे ये भी लगता है कि हर व्यक्ति को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए कम से कम एक वर्ष बिलकुल प्राकृतिक रूप में, पशुओं या अन्य प्राणियों की तरह बिना आधुनिक संसाधनों के, यथासम्भव जंगल में जाकर बिताना चाहिए. आप यह भी बताएं, कि आप अपने इस "प्राकृतिक" वर्ष को किस उम्र में मनाना पसंद करेंगे ?             

Sunday, April 6, 2014

अणु, कोशिका,डेल्टा, बौर

बचपन का वह दौर बहुत अच्छा होता है जब हम लंचबॉक्स लेकर स्कूल जाते हैं और बिना किसी भेद-भाव के वह सब-कुछ पढ़ते हैं जो हमें वहाँ पढ़ाया जाता है.हमें इस बात की  बिल्कुल परवाह नहीं होती कि जो कुछ खाने के डिब्बे में है, वह किस भाव का है?
आज सुबह मुझे अपना स्कूल, मित्र और उस वक़्त की पढ़ाई याद आई.
विज्ञानं के शिक्षक जब पदार्थ के अणुओं में विखंडन की बात समझाते थे, थोड़ा कठिन तो लगता था. कोशिकाओं का और-और विखंडन, विचित्र लगता था.कैसे एक सघन बहती नदी डेल्टा में आकर असंख्य धाराओं में बँट जाती है, अद्भुत लगता था. पेड़ पर बौराये फूलों का फल बनने से पूर्व ही झाड़ दिया जाना कितने सलीके से समझाते थे शिक्षक.
उन सभी शिक्षकों का लाख-लाख धन्यवाद। उन्होंने ये सब न पढ़ाया होता, तो आज न राजनीति समझ में आती, न साहित्य !          

निराशा और ज़िद, दोनों ही नहीं है ये

आपको बहुत से लोग जीवन में ऐसे मिलते हैं जो लगातार "जो कुछ है" उस से असंतुष्ट रहते हुए उसे बदलना चाहने, बदल न पाने की  अपनी मंशा से जूझते रहते हैं.
ऐसे लोगों पर आप दो तरह की  प्रतिक्रिया देते हैं- या तो ये लोग निराशावादी हैं जो किसी भी बात से खुश नहीं हैं, या फिर ज़िद्दी हैं कि जो कुछ है उसे बदल कर ही इन्हें चैन आता है.
एकबार सुदूर गाँव के एक दुरूह खेत पर एक वृद्ध औरत काम कर रही थी.वह सुबह जब खेत पर आई थी तो उसने भिनसारे ही अपने चौदह साल के लड़के को यह कह कर घर से प्रस्थान किया था कि खेत पर बहुत काम है. लड़के  ने उसके चले जाने के बाद नहा-धोकर चूल्हे पर रोटी बनाई, और एक कपड़े की पोटली में चार मोटी रोटी अपने लिए और दो अपनी माँ के लिए लेकर वह खेत की  ओर चल पड़ा.
जब वह खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी माँ ने धूप में पसीना बहाते हुए गोबर के उन सब उपलों के ढेर को उठा कर किनारे के बबूल के पेड़ के नीचे जमा कर दिया है, जिन्हें वह कल उसी पेड़ के नीचे के ढेर में से उठा-उठा कर पूरे खेत में फैला कर गया था.
वह बाल्टी उठाकर पीने का पानी भर लाने के लिए पास के कुए पर चला गया.कुए की  जगत पर उसने कपड़े  की एक पोटली टंगी देखी जिसमें सुबह-सुबह सूर्योदय से भी पहले उठ कर माँ द्वारा बना कर लाई गयी रोटियां थीं. माँ ने उससे पूछा कि क्या वह उन रोटियों को खा आया है जो माँ ने सुबह-सुबह उसके लिए बना कर रसोई के छींके पर टाँग दी थीं ? उसके पास किसी गाबदू की तरह माँ को देखे जाने के अलावा और कोई विकल्प न था. शब्दों के मितव्ययी वे माँ-बेटा अब एक-दूसरे से नाराज़ हुए, एकसाथ बैठ कर प्याज़ और रोटी खा रहे थे.           

Saturday, April 5, 2014

जीवन की एकरसता को तोड़ने की कोशिश आपको ही करनी होती है

जीवन के प्रति सबका नजरिया अलग-अलग होता है. इसे किस तरह जिया जाए, इस बात का फैसला कई तथ्य करते हैं. मुझे लगता है कि सबसे अहम् और ठोस तथ्य यह है कि जीवन में आपकी आवश्यकताएं क्या हैं? अधिकांश लोग अपनी ज़रूरतों का छोर देख नहीं पाते, और इसलिए यह मान कर चलते हैं कि ये कभी ख़त्म नहीं होंगी.वे आवश्यकताओं को अनंत मानते हैं और इनकी पूर्ति के लिए जीवन-पर्यन्त प्रयत्नशील  रहते हैं.
कुछ लोग इस सिद्धांत पर कायम रहते हैं कि जितना हो सके, अपने संसाधनों को अधिकतम किया जाए, और अपने हर दिन को पिछले दिन से अधिक संपन्न बनाया जाए.
मुझे लगता है कि ज़िंदगी को रेखीय सीध में न चला कर एक चढ़ते-उतरते ग्राफ की  भांति चलाया जाए तो शायद संतुष्टि का स्तर ज्य़ादा उन्नत होगा.
लेकिन इसका अर्थ यह हरगिज़ नहीं है कि २०-२० में लगातार जीतती आई भारतीय क्रिकेट टीम अब अगले मैच में हार जाए.अगला तो फ़ाइनल है और इसमें न जीतने का मतलब है, अपनी सारी मेहनत पर पानी फेर लेना.श्रीलंका पर जीत तो सब भारतीय लोगों को चाहिए.केवल भारतीय ही क्यों, विश्वभर में केवल श्रीलंका के शुभचिंतकों को छोड़ कर बाकी सभी को भी.             

Wednesday, April 2, 2014

क्या आप महिला सशक्तिकरण की दिशा में इस अवरोध को नहीं देखते?

हमारे देश की  शिक्षा व्यवस्था में एक व्यक्ति अठारह साल का होने तक कितना शिक्षित हो सकता है?
औसतन शायद वह सीनियर सेकण्ड्री पास कर सकता है।  अर्थात वह अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर सकता है।
इसी तरह एक व्यक्ति इक्कीस साल की  उम्र होने तक कितनी पढ़ाई कर सकता है?
साधारणतः नियमित रूप से पढ़ने वाला औसत विद्यार्थी इस आयु तक बी. ए. पास कर सकता है।
आइये अब देखें कि एक नया घर बनाते समय हमारा क़ानून क्या चाहता है?
हमारा कानून चाहता है कि जब एक स्त्री और एक पुरुष विवाह करके जीवनसाथी के रूप में एक नयी ज़िंदगी शुरू करें, तो इस नए घर में बी.ए.पास लड़का हो और सीनियर सेकण्ड्री पास लड़की।
आप जानते हैं कि यदि दो जुड़वां बच्चे एक साथ भी पैदा हों, तो उनमें आयु का पाँच मिनट का भी अंतर होने पर एक को बड़ा और दूसरे को छोटा कहा जाता है।  जीवन भर हर काम और रिश्तों में उम्र के इसी अंतर के आधार पर सब कुछ निर्धारित होता है।
आप खुद सोचिये कि यदि कोई व्यक्ति दूसरे से तीन वर्ष बड़ा हो तो उसकी वरिष्ठता जीवनभर होगी या नहीं?
ऐसी व्यवस्था हो जाने के बाद जीवन भर दोनों को "समान" कहना क्या महिलाओं के साथ अन्याय नहीं है?
यदि क़ानून यह समझता है कि कम पढ़ीलिखी , छोटी उम्र की लड़की और ज्यादा पढ़ेलिखे, बड़ी उम्र के लड़के से ही नया घर ज्यादा अच्छी तरह चलेगा, तो क्या कानून यह व्यवस्था नहीं कर सकता कि शादी के बाद लड़की नहीं, बल्कि लड़का अपना घर छोड़ेगा !   

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...